अंधेरे को चीरती किरणें : स्त्री शोषण, उत्पीड़न और अपराध के खिलाफ ज्वार

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अंधेरे को चीरती किरणें : स्त्री शोषण, उत्पीड़न और अपराध के खिलाफ ज्वार
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Crime Against Women-भारत देश की आत्मा में स्त्री शक्ति गूंजती है, वो मां दुर्गा की अदम्यता से लेकर लक्ष्मी के समृद्धिदायक हाथों तक फैली है. पर दुखद सच ये भी है कि आज भी हमारी लाख कोशिशों के बावजूद लगभग 37% भारतीय महिलाएं शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती हैं. हर दो मिनट में एक महिला घरेलू हिंसा झेलती है, और हर 18 घंटे में एक बलात्कार का मामला दर्ज होता है. ये सिर्फ आंकड़े नहीं, ये मानवता पर लगे जख्म हैं, जिन्हें भरने की ज़रूरत है.

लेकिन अंधकार के साए में उम्मीद की किरणें भी जल रही हैं. 102 साल की कर्मा देवी, जिन्होंने अपनी पोती के बलात्कार के आरोपियों को जेल पहुंचाने के लिए अथक संघर्ष किया, वो हर शोषित स्त्री के लिए प्रेरणा हैं. वहीं, गुलाबो सिन्हा, जिन्होंने 17 साल की उम्र में एसिड हमले का सामना किया, आज खुद की एनजीओ चलाती हैं और अन्य पीड़ितों को संबल देती हैं. ये कहानियां साबित करती हैं कि शोषण की आग में भी हिम्मत की चिनगारी बुझ नहीं सकती.

तो क्या हम हार मान लें? बिल्कुल नहीं! ये वक्त निराश होने का नहीं, बल्कि आवाज उठाने का, जागरूकता फैलाने का और समाधान ढूंढने का है. आइए एक ऐसा भारत बनाएं जहां:

  • बेटियों को बौझ नहीं, बल्कि बदलाव की शक्ति माना जाए: प्रत्येक लड़की को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करें. आर्थिक स्वतंत्रता के रास्ते खोलें, कौशल विकास पर ज़ोर दें, ताकि वो आत्मनिर्भर बन सकें.
  • समाज की जड़ों में पनपे रूढ़िवादी विचारों को उखाड़ें: दहेज प्रथा के खिलाफ सख्त कानून लागू करें, बाल विवाह को रोकें, और बेटियों के जन्म को खुशियों से मनाएं, न कि शोक से.
  • पीड़िताओं के लिए सहयोगी वातावरण तैयार करें: महिला पुलिस थानों का जाल बिछाएं, संवेदनशील पुलिस प्रशिक्षण सुनिश्चित करें, ताकि पीड़िताएं बेझिझक शिकायत दर्ज कर सकें.
  • लैंगिक समानता को सिर्फ नारा नहीं, हकीकत बनाएं: कार्यस्थल पर समान वेतन और पदोन्नति के अवसर दें, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करें, और हर क्षेत्र में स्त्री प्रतिनिधित्व बढ़ाएं.

शोषण की जड़ें उखाड़ो: दहेज प्रथा, बाल विवाह, शिक्षा का अभाव, आर्थिक निर्भरता, ये वो जहरीली जड़ें हैं जो स्त्रियों के विकास को रोकती हैं. इन जड़ों को उखाड़ना ही होगा. बेटियों को पढ़ाओ, आत्मनिर्भर बनाओ, तभी वो शोषण के जाल से मुक्त हो पाएंगी.

उत्पीड़न की आवाज दबाओ मत: छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, स्त्री विरोधी रूढ़िवादी सोच, ये वो दीवारें हैं जो स्त्रियों की स्वतंत्रता को सीमित करती हैं. इन दीवारों को ढाहना होगा. पीड़िताओं की आवाज दबाओ मत, उनकी रक्षा कानून और समाज मिलकर करे.

अपराध के खिलाफ डटो: दुष्कर्म, एसिड अटैक, मानव तस्करी, ये वो जख्म हैं जो समाज के चेहरे को कुरूप बनाते हैं. इन जख्मों पर मरहम लगाना होगा. अपराधियों को कठोर सजा मिले, पुलिस व्यवस्था संवेदनशील हो, तभी स्त्रियां सुरक्षित महसूस करेंगी.

परिवर्तन की लहर बनो: हर व्यक्ति, हर परिवार, हर समुदाय को स्त्री सम्मान का वाहक बनना होगा. बेटियों को प्यार दो, शिक्षा दो, स्वतंत्रता दो. बेटियों को ब बोझ नहीं, बल्कि समाज का बल समझो. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दो, आर्थिक सशक्तिकरण के अवसर दो.

ये लड़ाई सिर्फ कानून या सरकार की नहीं है, ये हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है. आइए मिलकर एक ऐसा समाज बनाएं जहां स्त्रियां निर्भय होकर जी सकें, जहां उनकी उपलब्धियां गौरव का विषय हों, जहां उन्हें सम्मान मिले, स्वतंत्रता मिले, हक मिले. अंधेरे को चीरने वाली किरणें बनो, स्त्री शोषण, उत्पीड़न और अपराध के खिलाफ ज्वार लाओ.

ये सिर्फ सपने नहीं, ये हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी हैं. हर पिता बेटी को सुरक्षा का वचन दे, हर स्कूल लैंगिक समानता की पाठ पढ़ाए, हर समुदाय में पीड़िताओं की आवाज़ दबने न पाए. ये वक्त बदलाव लाने का है, आइए मिलकर अंधेरे को मिटाएं और स्त्री शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ उम्मीदों का जाल बुनें, ताकि आने वाली पीढ़ी एक सुरक्षित और स्वतंत्र भारत देख सके.

याद रखिए, हर छोटा बदलाव मायने रखता है. आज अपनी बेटी, बहन, मां और हर स्त्री के सम्मान की कसम खाएं, तभी हम एक नया भारत, एक उम्मीदों से भरा भारत बना पाएंगे.

Girl in a jacket

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